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ट्रेन की लेटलतीफी पर जमशेदपुर विधायक सरयू करेंगे टाटानगर स्टेशन में धरना प्रदर्शन, रेल मंडल में मचा हड़कम्प, मनाने पहुंचे DRM

  • Writer: RailMantra Bureau
    RailMantra Bureau
  • Apr 6
  • 4 min read

जमशेदपुर: चक्रधरपुर रेल मंडल इन दिनों सिर्फ एक रेल मंडल नहीं, बल्कि सिस्टम की सुस्ती का आईना बन चुका है। ट्रेनों की लेटलतीफी अब इस रेल मंडल में अपवाद नहीं, बल्कि रोज़ की कहानी बन गई है. रेल मंडल में कहीं 5 घंटे, तो कहीं 20 घंटे की देरी तक ट्रेनें चल रही हैं। लेट चल रही ट्रेनों के कारण कोई नौकरी खो रहा है, कोई पढ़ाई और परीक्षा खो रहा है तो कोई इलाज का मौका भी गंवा रहा है. ज्यादातर यात्रियों का तो पूरा का पूरा यात्रा प्लान चौपट हो रहा है.



सवाल यह है कि क्या रेलवे अब “यात्री सेवा” से हटकर सिर्फ “माल ढुलाई” तक सिमट गया है? यही बड़ा मुद्दा उठाया है जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने, जिन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि अगर ज़रूरत पड़ी तो मालगाड़ियों को रोककर यात्री ट्रेनों को समय पर चलाना होगा। इसी मुद्दे को लेकर जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने मोर्चा खोल दिया है और 7 अप्रैल को टाटानगर स्टेशन के सामने धरने का ऐलान कर दिया है। विधायक के इस ऐलान से चक्रधरपुर रेल मंडल के अधिकारियों में हड़कंप मचा हुआ है. स्थिति ऐसी है की रविवार को डीआरएम तरुण हुरिया ने विधायक सरयू राय से टाटानगर स्टेशन में मुलाक़ात की है और आन्दोलन को टालने की अपील की, लेकिन विधायक ने साफ़ कह दिया समय पर यात्री ट्रेन नहीं चली तो आन्दोलन हर हाल में होगा.  


7 अप्रैल को टाटानगर स्टेशन के सामने प्रस्तावित धरना अब सिर्फ एक विरोध नहीं, बल्कि उस गुस्से की अभिव्यक्ति है, जो हर उस यात्री के मन में है जिसकी ज़िंदगी ट्रेन की घंटों लेट लतीफी के कारण पटरी से उतर रही है।



इस पुरे कहानी को समझें, तो इसकी पहली परत में दिखती है—व्यवस्था की सुस्ती और जवाबदेही की कमी।


चक्रधरपुर रेल मंडल, जो देश में माल ढुलाई के मामले में अग्रणी रेल मंडलों में शुमार रहता है, वही चरधारपुर रेल मंडल यात्री ट्रेनों के संचालन में बुरी तरह फिसल रहा है। रोजाना पैसेंजर और एक्सप्रेस ट्रेनें घंटों लेट हो रही हैं। हैरानी की बात यह है कि कई ट्रेनें टाटानगर या झारसुगुडा या फिर चांडिल स्टेशन से कुछ किलोमीटर पहले तक समय पर रहती हैं, लेकिन जैसे ही स्टेशन के करीब पहुंचती है और चक्रधरपुर रेल मंडल में प्रवेश करती है, उनकी रफ्तार थम जाती है और वे घंटों तक सिग्नल का इंतजार करती रहती हैं। सवाल उठता है, क्या यह महज तकनीकी समस्या है या फिर प्राथमिकताओं का खेल?


दूसरी परत में खुलती है—रेलवे की नीति और नीयत पर बहस।


विधायक सरयू राय ने साफ शब्दों में कहा है कि अब रेलवे “जनसेवा” से ज्यादा “राजस्व” पर केंद्रित हो गया है। उनका आरोप है कि ज्यादा कमाई के लालच में मालगाड़ियों को प्राथमिकता दी जा रही है और यात्री ट्रेनों को घंटों खड़ा रखा जाता है। उन्होंने यहां तक कह दिया कि जो भारतीय संस्कृति में व्यापारी “शुभ लाभ” कह कर व्यापार करते हैं. वहीँ भारतीय रेल अब शुभ लाभ की जगह अब “लोभ लाभ” हावी हो गया है। क्या वाकई भारतीय रेलवे का फोकस बदल गया है? क्या आम यात्री अब सिस्टम की प्राथमिकता में नहीं है?



तीसरी परत में आता है—रेलवे प्रशासन का पक्ष।


चक्रधरपुर रेल मंडल के डीआरएम तरुण हरिया ने माना है कि कुछ तकनीकी और परिचालन कारणों से ट्रेनें लेट हो रही हैं। उन्होंने भरोसा दिलाया कि समस्याओं को दूर करने की दिशा में काम चल रहा है और जल्द सुधार देखने को मिलेगा। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि ये “तकनीकी कारण” आखिर कब तक यात्रियों के धैर्य की परीक्षा लेते रहेंगे? क्या इन समस्याओं का कोई ठोस टाइमलाइन है या फिर यह सिर्फ आश्वासन तक सीमित रहेगा?


अब चौथी और सबसे अहम परत—इस लेटलतीफी का सीधा असर आम लोगों पर हो रहा है।


यह सिर्फ ट्रेन के देर से आने का मामला नहीं है, बल्कि हजारों जिंदगियों पर पड़ने वाला असर है। मजदूर रोज़गार खो रहे हैं क्योंकि वे समय पर काम पर नहीं पहुंच पाते, छात्र अपनी परीक्षाएं और क्लासेस मिस कर रहे हैं, मरीज अस्पताल और डॉक्टर तक नहीं पहुंच पा रहे हैं, और आम यात्रियों की पूरी यात्रा योजना चौपट हो रही है। कई मामलों में लोग घंटों नहीं, बल्कि 10 से 20 घंटे तक इंतजार करने को मजबूर हैं। यह स्थिति केवल असुविधा नहीं, बल्कि मानसिक और आर्थिक उत्पीड़न की श्रेणी में भी आती है।


पांचवीं परत—आंदोलन और बढ़ता जनाक्रोश।


7 अप्रैल को प्रस्तावित धरना अब केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक बड़े जन आंदोलन का संकेत बन चुका है। सरयू राय ने इसे राजनीतिक रंग देने से इनकार करते हुए सभी दलों और आम जनता से समर्थन की अपील की है। उनका कहना है कि जब तक ट्रेनों की लेटलतीफी पर लगाम नहीं लगती, यह जनता का आंदोलन जारी रहेगा। रेलवे को विधायक सरयू राय ने स्पष्ट रूप से संदेश दे दिया गया है की या तो अब व्यवस्था सुधरेगी, या फिर विरोध और तेज होगा।


कुल मिलाकर चक्रधरपुर रेल मंडल में सिर्फ ट्रेनों की देरी की कहानी नहीं, बल्कि सिस्टम की प्राथमिकताओं की परीक्षा है। अगर रेलवे आम यात्रियों की परेशानी को गंभीरता से नहीं लेता, तो आन्दोलन के लिए मजबूर किये जा रहे जनता का गुस्सा और तेज होगा. अब आखिर में सवाल सीधा है—क्या रेलवे मुनाफे की पटरी पर दौड़ता रहेगा या फिर यात्रियों की उम्मीदों को भी अपनी रफ्तार में शामिल करेगा?

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